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Thursday, June 13, 2024

गौरैया धाम में खुदाई करने से निकलती है पाषाण मूर्तियां, अब तक 143 मूर्तियों का संरक्षण, आस्था के इस धाम के बारे में आप भी जानिए…

टीकम पिपरिया. बालोद
बालोद जिले के गुंडरदेही विकासखंड के ग्राम चौरेल में स्थित गौरैया धाम कई समाजों का संगम है। तांदुला नदी के किनारे प्राकृतिक सौंदर्य के बीच एक टीला नुमा जगह पर स्थित गौरैया धाम में कई ऐसी मूर्तियां है जो यहां किसी समय राजा महाराजाओं के निवास होने व धार्मिक आस्था का केंद्र होने का प्रमाण देता है। पुरातात्विक महत्व की इन मूर्तियों के कारण इसे पर्यटन क्षेत्र घोषित किया गया है। यहां का धार्मिक महत्व भी काफी बड़ा है, प्रत्येक वर्ष माघ पूर्णिमा में देवी-देवताओं का दर्शन करने लाखों की संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं। गौरैया धाम के इतिहास के बारे में कोई स्पष्ट साक्षी वह प्रमाण नहीं है कुछ किवदंतियों के आधार पर ही लोग इसके बारे में बताते हैं लेकिन यहां की खुदाई से निकलने वाली वस्तुएं इसके विशेष जगह होने की ओर इशारा करती है।

जिला मुख्यालय बालोद से दुर्ग मार्ग पर 18 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम पैरी से बाई दिशा में लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर तांदुला नदी के सुरम्य तट पर स्थित है गौरैया धाम। यह क्षेत्र ग्राम चौरेल के अंतर्गत आता है। इसके उद्गम के बारे में कई कथाएं प्रचलित है। इनमें सबसे प्रमुख यह है जिसमें कहा गया है कि एक बार सभी देवी देवता तीर्थ भ्रमण करते हुए शिवरात्रि में यहां पहुंचे और यहीं पर समाधि में लीन हो गए। भगवान शिव ने समाधि खुलने के बाद देखा कि माता गौरी व गौरैया पक्षी अपने हाथों में चावल लिए प्रभु की भक्ति में लीन हैं। भगवान शिव ने दोनों की सेवा भाव से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया। शिव ने गौरैया को आशीर्वाद दिया कि तुम मेरा संदेश घर-घर पहुंचना।

माना जाता है कि इसलिए गौरैया पक्षी चिंव – चिंव (शिव शिव) कर भगवान शिव का स्मरण घर घर करते हैं। गौरैया वह पक्षी है जो बहुत छोटी होती है और हर घरों में पाई जाती है। जिसे हम गांव में गोड़ेला चिरई करते हैं। हमेशा उनके मुंह से चिंव – चिंव की आवाज निकलती रहती है। (इस संबंध में यहां के निवासी स्वर्गीय द्वारिका प्रसाद चंद्राकर की हस्तलिखित एक कागज ही समिति के पास है।) इसके अलावा एक किवदंतियां यह भी है कि एक बार यहां गौरैया जाति के एक बाबा आए थे जो सांप पकड़ने का काम करते थे। वह यही निवास करने लगे और हमेशा भगवान शंकर की भक्ति में डूबे रहते थे। उनकी मौत के बाद यहां मूर्ति बना दी गई जो आज भी पीपल पेड़ के नीचे स्थापित है। उसके नाम के अनुरूप इस जगह को गौरैया धाम कहकर लोग पूजा अर्चना करने लगे।

सामाजिक और धार्मिक महत्व की जगह
गौरैया धाम का सामाजिक व धार्मिक महत्व भी है इस बात का प्रमाण यह है कि यहां पर कई समाजों के सार्वजनिक भवन बने हुए हैं, उनके इष्ट देवताओं के मंदिर भी हैं। यहां पर सतनामी समाज, साहू समाज, गोंड़ समाज, महाराष्ट्र के भोंगारे समाज का मंदिर काफी पुराने समय से बना हुआ है। माना जाता है कि यहां पर पहले सभी समाज के लोग एकत्रित होकर अपने सामाजिक कार्यक्रमों को गति प्रदान करते थे। माघ पूर्णिमा के मेले में यहां पर आज भी महाराष्ट्र से भोंगारे परिवार के कई लोग पहुंचकर अपने इष्ट देव की पूजा अर्चना करते हैं। इसके अलावा यहां पर राम जानकी मंदिर, भगवान जगन्नाथ मंदिर, शिवज्योतिर्लिंग, दुर्गा मंदिर, राधा कृष्ण मंदिर, पंचमुखी हनुमान मंदिर, संत कबीर मंदिर, बूढ़ादेव मंदिर, गुरु घासीदास मंदिर, शिव धाम, संत कबीर मंदिर, गायत्री मंदिर आदि मंदिरों का समूह है।

खुदाई से निकली हैं सैकड़ों पाषाण मूर्तियां
गौरैया धाम का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यहां जब भी किसी कार्य के लिए खुदाई की जाती है तो पाषाण मूर्तियां निकलती है। यहां एक बावली है बताया जाता है कि इस बावली की खुदाई के समय यहां से कई मूर्तियां निकली इसके अलावा जब भी कोई मंदिर निर्माण करना होता है तो उसकी नींव की खुदाई के समय भी मूर्तियां निकलती है। ऐसी मूर्तियां को यहां पर सहेज कर रखा गया है जिनकी संख्या 143 है। समिति के लोगों का कहना है कि कई मूर्तियां पहले लोगों के द्वारा ले जाई गई है। मूर्तियों के बारे में कहा जाता है कि यह आठवीं से 12वीं शताब्दी की है मूर्तियों में चांद, तारे, सूरज, चक्र, हाथ आदि के निशान हैं, जो फणि नागवंशी शासको के समकालीन होने की पुष्टि करती है। मंदिर का संचालन वर्तमान में न्यास श्री गौरैया सिद्ध शक्तिपीठ के द्वारा किया जा रहा है।

चार स्थानों को मिलाकर बनता है गौरैया मेला
तांदुला नदी के किनारे मुख्य रूप से चार स्थानों को मिलाकर गौरैया मेला कहा जाता है। यहां पर नदी के एक तरफ गौरैया धाम और मोहलई पार है तो दूसरी तरफ पैरी पार क्षेत्र में विमल वैदिक आश्रम है। माघ पूर्णिमा में लगने वाले गौरैया मेला के दिन इन तीनों जगह पर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। इन तीनों जगहों के अलावा यहां स्थित गुरु घासीदास मंदिर में भी वृहद आयोजन किया जाता है। कुल मिलाकर चारों जगहों पर रात में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। श्रद्धालु चारों तरफ घूम-घूम कर कार्यक्रमों का आनंद लेते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि यहां भीड़ रुकती नहीं बल्कि चलती रहती है।

पर्यटन स्थल घोषित होने के बाद भी कई समस्याएं
गौरेया मेला क्षेत्र को 2008 में पर्यटन क्षेत्र घोषित किया गया है। इसके बावजूद यहां समस्याओं का अंबार है। इस ओर कोई भी ध्यान नहीं दिया गया। सबसे बड़ी समस्या नदी के किनारे घाट को लेकर है। मेला आयोजन समितियों ने नदी के किनारे घाट बनाने की मांग कई बार की है। लेकिन अब तक शासन प्रशासन का ध्यान इस ओर नहीं गया है। लोगों का कहना है कि घाट बन जाने से स्नान करने के लिए श्रद्धालुओं को न केवल सुविधा मिलेगी बल्कि मेला परिसर भी खूबसूरत लगेगा।

पैरी पार में मेला उद्गम का श्रेय जाता है स्वामी सुजनानंद महाराज को
गौरैया मेला का एक मुख्य हिस्सा पैरी पार भी होता है। तांदुला नदी के एक किनारे को चौरेल पार बोलते हैं तो दूसरे तट को पैरी पार कहा जाता है। इस तरफ मेले के उद्गम का श्रेय स्वामी सुजनानंद महाराज (हीरालाल शास्त्री) को जाता है। बताया जाता है कि पैरी पार में 1961 से मेला लगता आ रहा है। स्वामी जी के नेतृत्व में यहां कई बड़े-बड़े आयोजन हुए। वही उन्हीं के नेतृत्व में श्री रामायण सेवा समिति का गठन भी हुआ, जिनकी देखरेख में यहां हायर सेकेंडरी स्कूल का संचालन भी किया जा रहा है। हीरालाल शास्त्री का जन्म दुर्ग जिले के धमधा विकासखंड के ग्राम रसी में मालगुजार ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे पहले फौज में थे रिटायरमेंट के बाद बीएसपी में नौकरी लगी।

इसी दौरान रामचरितमानस के प्रति उनके मन में अगाध श्रद्धा जागी और वे नौकरी के साथ-साथ गांव-गांव जाकर श्री रामचरितमानस का प्रचार करने लगे। सन 1961 में संत विनोबा भावे का बालोद जिले के ग्राम लाटाबोड़ में आना हुआ। सर्वोदयी विचारधारा से प्रभावित शास्त्री जी भी इसमें शामिल हुए। सुजनानंद महाराज के वक्तव्य को सुनने के बाद ग्राम पैरी निवासी कलीराम पटेल ने उन्हें अपने ग्राम चलने का अनुरोध किया और 21 जनवरी 1961 को सुजनानंद जी पैरी आ गए यहां वे श्री रामचरितमानस के प्रसंग पर प्रवचन देकर लोगों को व्यसन से मुक्ति दिलाने का प्रयास किया। इसी दौरान जब एक दिन तांदुला नदी में सुबह स्नान करने गए तो नदी के किनारे बीहड़ जंगल देखकर उन्होंने यहां पर आश्रम बनाने की इच्छा जाहिर की। इसके बाद उन्होंने जमीन मालिकों से संपर्क साधा। हीरालाल शास्त्री जी के विचारों से प्रभावित होकर गांव के तनगूराम साहू, मनहरण लाल साहू, उजियालिक साहू, चंदूलाल साहू, तुलसीराम साहू आदि ने अपनी जमीन दान की और इसके बाद यहां पर शुरू हुआ धार्मिक कार्यों का आयोजन।

पहले छोटे-छोटे आयोजन होते थे 1975 में 1001 कुंडीय विशाल गायत्री महायज्ञ के आयोजन के बाद पैरी पार में भी बड़ा मेला लगा शुरू हुआ। यहीं रहते रहते 1963-64 में शास्त्री जी के संपर्क में पचपेड़ी निवासी अंकट राम मढ़रिया एवं अन्य ग्रामों के कुछ सहयोगी भी आए। इसी वर्ष औपचारिक रूप से श्री रामायण सेवा समिति का गठन किया गया, जिसमें कई गांव के लोग सदस्य बने। आज इस समिति द्वारा श्री विमल वैदिक सेवा आश्रम पैरी व श्रीराम जानकी आश्रम सगनी संचालित है। इसके अलावा समिति द्वारा श्री राम विद्या मंदिर उच्चतर माध्यमिक शाला पैरी की स्थापना की गई। पैरी पार में आयोजित कार्यक्रमों में स्वामी ओमप्रकाशानंद सरस्वती, स्वामी दिव्यानंद सरस्वती, विश्व बंधु शास्त्री, सत्य मित्र शास्त्री आदि धार्मिक विद्वान उपस्थित हुए वहीं तत्कालीन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पंडित श्यामा चरण शुक्ल, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह, केंद्रीय मंत्री अरविंद नेता सहित कई मंत्री व विधायक यहां पहुंच चुके हैं।

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