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Saturday, May 18, 2024

छत्तीसगढ़ बनने के बाद 9 विधानसभा सीटें जहां कभी नहीं जीती भाजपा, 2023 में क्या बन रहा राजनीतिक समीकरण…?

रायपुर. न्यूजअप इंडिया
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में प्रत्याशियों की घोषणा के साथ राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। भाजपा सत्ता में वापसी को लेकर एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है, वहीं कांग्रेस के पास सत्ता बरकरार रखने की चुनौती है। छत्तीसगढ़ में कुछ ऐसी विधानसभा सीटें भी है, जहां राज्य गठन के बाद एक बार भी कमल नहीं खिला है। ऐसी सीटों की संख्या 9 है। इन सीटों पर प्रत्याशियों को जिताने भाजपा ज्यादा जोर भी लगा रही है। इन विधानसभा सीटों में सीतापुर, पाली-तानाखार, मरवाही, मोहला-मानपुर, कोंटा, खरसिया, कोरबा, कोटा और जैजैपुर शामिल हैं। सूबे में 15 साल तक शासन करने के बाद भी भाजपा इन सीटों पर कभी नहीं जीत सकी। इन नौ विधानसभा सीटों में मरवाही, सीतापुर, पाली-तानाखार, मोहला-मानपुर और कोंटा अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं, जबकि अन्य चार सामान्य सीटें हैं।

बता दें कि साल 2000 में मध्य प्रदेश से अलग कर के छत्तीसगढ़ राज्य का गठन किया गया था। छत्तीसगढ़ में 2003 में विधानसभा का पहला चुनाव हुआ था। उस समय भाजपा ने अजीत जोगी की सरकार को शिकस्त देकर सरकार बनाई थी। बाद में भाजपा ने 2008 और 2013 के विधानसभा चुनावों में भी जीत हासिल की थी। साल 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा के विजय रथ को रोककर डॉ. रमन सिंह के 15 साल के शासन को समाप्त कर दिया था। कांग्रेस ने इस चुनाव में 90 सदस्यीय विधानसभा में से 68 सीट जीती थीं। तीन उप-चुनाव को जीतने के बाद कांग्रेस के पास अभी वर्तमान में 71 विधायक हैं। इस बार के चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने 22 मौजूदा विधायकों का टिकट काट दिया है, जिसे भारतीय जनता पार्टी के नेता मुद्दा बनाकर भुनाने में लगे हैं। कई विधायक बागी या दूसरे दल से चुनाव भी लड़ रहे हैं।

नक्सल क्षेत्र कोंटा पर कवासी का लंबे समय से कब्जा
जिन 9 सीटों पर कमल नहीं खिला उसमें बस्तर क्षेत्र का नक्सल प्रभावित कोंटा विधानसभा क्षेत्र भी शामिल हैं, जहां से राज्य के आबकारी मंत्री कवासी लखमा विधायक हैं। लखमा एक बार फिर कांग्रेस की ओर से चुनाव मैदान में हैं। लखमा क्षेत्र के प्रभावशाली आदिवासी नेता हैं। वह 1998 से लगातार पांच बार इस सीट से जीत चुके हैं। भाजपा ने इस सीट से नए चेहरे सोयम मुक्का को मैदान में उतारा है। मुक्का माओवादियों के खिलाफ लड़ाई लड़ चुके ‘सलवा जुडूम’ के पूर्व कार्यकर्ता हैं। कोंटा क्षेत्र में पहले चरण में 7 नवंबर को मतदान होना है। कोंटा सीट पर ज्यादातर कांग्रेस, भाजपा और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होता आया है। इस बार भी यही स्थिति बन रही है।

सीतापुर पर सीएम भूपेश के मंत्री भगत ठोंक रहे ताल
राज्य के उत्तर क्षेत्र सरगुजा संभाग की सीतापुर सीट भी एक ऐसी सीट है, जहां से भाजपा कभी नहीं जीती। कांग्रेस के एक और प्रभावशाली आदिवासी नेता तथा भूपेश बघेल सरकार में मंत्री अमरजीत भगत राज्य के गठन के बाद से ही सीतापुर सीट से जीतते रहे हैं। भाजपा ने सीतापुर सीट से नए चेहरे राम कुमार टोप्पो को मैदान में उतारा है। टोप्पो हाल ही में फोर्स की नौकरी छोड़ भाजपा में शामिल हुए हैं। इस बार भी यहां भाजपा-कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर है।

1977 से अब तक खरसिया सीट कांग्रेस का ही कब्जा
कांग्रेस सरकार में एक और मंत्री उमेश पटेल खरसिया सीट से लगातार तीसरी बार चुनाव लड़ रहे हैं। 1977 में अस्तित्व में आने के बाद से ही यह सीट कांग्रेस का गढ़ रही है। उमेश पटेल के पिता नंद कुमार पटेल, प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे। 2013 में बस्तर में झीरम घाटी नक्सली हमले में पटेल की मृत्यु हो गई थी। वह इस सीट से पांच बार चुने गए थे। खरसिया सीट से भाजपा ने नए चेहरे महेश साहू को मैदान में उतारा है। रायगढ़ जिले की खरसिया सीट 1988 में तब सुर्खियों में आई, जब कांग्रेस के दिग्गज नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने खरसिया (पहले मध्य प्रदेश अब छत्तीसगढ़ का हिस्सा) से जीत हासिल की थी। पिछले चुनाव में भाजपा ने पूर्व IAS ओपी चौधरी को चुनावी मैदान में उतारा था, लेकिन वे उमेश पटेल से चुनाव हार गए। इस बार उन्हें रायगढ़ से टिकट दिया गया है।

मरवाही-कोटा भी कांग्रेस का गढ़, JCCJ की भी जीत
छत्तीसगढ़ की मरवाही और कोटा सीट भी कांग्रेस का गढ़ रही है, इससे पहले 2018 में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) ने दोनों सीट पर जीत हासिल की थी। वर्ष 2000 में राज्य के गठन के बाद कांग्रेस सरकार के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने 2001 में मरवाही से उप-चुनाव जीता था। बाद में उन्होंने 2003 और 2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर दो बार इस सीट से जीत हासिल की। वर्ष 2013 में उनके बेटे अमित जोगी ने इस सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। 2018 में अजीत जोगी ने अपने नवगठित राजनीतिक दल जेसीसी (जे) के टिकट पर इस सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। बाद में 2020 में अजीत जोगी की मृत्यु के बाद हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने यह सीट जीत ली। इसी तरह अजीत जोगी की पत्नी रेणु जोगी ने 2006 में कांग्रेस विधायक राजेंद्र प्रसाद शुक्ला की मृत्यु के बाद कोटा सीट पर हुए उपचुनाव में जीत हासिल की थी। इसके बाद रेणु जोगी ने 2008 और 2013 के चुनावों में दो बार कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में और 2018 में जेसीसी (जे) उम्मीदवार के रूप में इस सीट से जीत हासिल की।

कोरबा, पाली-तानाखार, जैजैपुर और मोहला-मानपुर
भाजपा ने कोटा और मरवाही सीट से नए चेहरे प्रबल प्रताप सिंह जूदेव और प्रणव कुमार मरपच्ची को मैदान में उतारा है। युवा मोर्चा के पूर्व उपाध्यक्ष जूदेव भाजपा के दिग्गज नेता दिवंगत दिलीप सिंह जूदेव के बेटे हैं, जबकि मारपच्ची भारतीय सेना में काम कर चुके हैं। कांग्रेस ने मरवाही से अपने वर्तमान विधायक केके ध्रुव और कोटा से छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड के अध्यक्ष अटल श्रीवास्तव को मैदान में उतारा है। चार अन्य सीट कोरबा, पाली-तानाखार, जैजैपुर और मोहला-मानपुर पर भाजपा कभी नहीं जीती और ये सीट 2008 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई थीं। इन सीटों पर कहीं भाजपा-कांग्रेस में आमने-सामने तो कहीं त्रिकोणीय मुकाबला इस चुनाव में देखने को मिल सकता है।

पाली-तानाखार और कोरबा सीट पर दिलचस्प मुकाबला
सूबे की पाली-तानाखार सीट पर दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल रहा है। यहां भाजपा ने राम दयाल उइके को मैदान में उतारा है, जो 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़कर भाजपा में लौट आए थे। उइके 1998 में मरवाही सीट से भाजपा की टिकट पर विधायक चुने गए थे। बाद में वह कांग्रेस में शामिल हो गए। जब अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बने तब उइके ने जोगी के लिए अपनी सीट खाली कर दी थी। कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में उइके ने 2003 में तानाखार (जो परिसीमन के बाद पाली तानाखार बन गया) और उसके बाद 2008 और 2013 में पाली तानाखार सीट पर जीत हासिल की। उइके 2018 में भाजपा में लौट आए और पाली-तानाखार से चुनाव लड़ा। लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार से हार गए। उइके को भाजपा ने पाली तानाखार से फिर से उम्मीदवार बनाया है, जहां कांग्रेस ने अपने मौजूदा विधायक को टिकट नहीं देकर महिला दुलेश्वरी सिदार को मैदान में उतारा है। बघेल सरकार के मंत्री जयसिंह अग्रवाल परिसीमन के बाद अस्तित्व में आए कोरबा सीट पर 2008 से अजेय हैं। भाजपा ने कोरबा से कांग्रेस के अग्रवाल के खिलाफ अपने पूर्व विधायक लखनलाल देवांगन को मैदान में उतारा है।

जैजैपुर पर BSP का कब्जा, मोहला-मानपुर कांग्रेस के पास
छत्तीसगढ़ का जैजैपुर (जांजगीर-चांपा जिला) सीट वर्तमान में दो बार के बहुजन समाज पार्टी के विधायक केशव चंद्रा के पास है। कांग्रेस ने अपने जिला युवा कांग्रेस के प्रमुख बालेश्वर साहू और भाजपा ने अपने जिला इकाई के प्रमुख कृष्णकांत चंद्र को मैदान में उतारा है। जैजैपुर सीट को बहुजन समाज पार्टी का गढ़ माना जाता है। छत्तीसगढ़ में जैजैपुर से बसपा ने जीत की शुरुआत की थी। 2023 के चुनाव में यहां त्रिकोणीय मुकाबला होने के आसार हैं। नक्सल प्रभावित मोहला-मानपुर सीट पर कांग्रेस ने अपने वर्तमान विधायक इंद्रशाह मंडावी को मैदान में उतारा है, वहीं पूर्व विधायक संजीव शाह भाजपा के उम्मीदवार हैं। मोहला मानपुर सीट 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई। मोहला-मानपुर को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। यह सीट एसटी वर्ग के लिए आरक्षित है। पिछले तीन चुनाव में कांग्रेस का इस सीट पर कब्जा है।

कांग्रेस ने 75 प्लस सीटें जीतने का रखा है लक्ष्यः सीएम भूपेश
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कह चुके हैं कि छत्तीसगढ़ हमेशा से कांग्रेस का गढ़ रहा है। यहां कुछ समय तक भाजपा की सरकार रही, लेकिन पिछले चुनाव में जनता ने भाजपा को पूरी तरह से नकार दिया था। विपक्षी दल इस बार उन सीट पर भी संघर्ष कर रहा है, जहां उसने पिछली बार जीत हासिल की थी। कांग्रेस ने 2018 के चुनाव में 68 सीट जीती थी और सरकार बनाई थी। भाजपा ने 15 सीट हासिल की थी। राज्य विधानसभा में वर्तमान में कांग्रेस के 71 विधायक हैं। इस बार कांग्रेस ने 75 सीट जीतने का लक्ष्य रखा है। कांग्रेस की इस बार भी सरकार बनेगी। भाजपा के पास कोई मुद्दा नहीं है। कांग्रेस ने सभी वर्गों का ख्याल रखा है और हर वर्ग के लिए काम किया है।

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